Sunday, March 1, 2026

नज़्म ए ज़िंदगी



एक तो तुम इतराती बहुत हो,
उस पर जीने से कतराती भी बहुत हो..

जो ज़िंदगी है ना मेरी, वो बिल्कुल भी इतराती नहीं,
कतराना क्या होता है ये तो जैसे वो जानती ही नहीं,
खुल के जीती है और खुल के जिलाती है,
मन ही मन जलती भी है और जलाती भी है बहुत..

बेहोश ना हो जाऊं कहीं मैं ग़म ए ज़िंदगी के आईने देख,
इसलिए,
दिल खोल के ज़िंदगी के जाम वो चखती भी है और चखाती भी बहुत है..

तुम लेती हो हिसाब पल पल का तो वो देती हैं खिताब हर पल का,
तुम खिंचवाती हो तस्वीर किसी से तो वो खींचती है तस्वीर मेरी..

तुम गर अज़ाब हो तो वो भी नायाब है,
तुम अगर ख़्वाब हो तो वो भी माहताब है 

असल में तो हक़ीक़त को सपनों से भी उतना ही प्यार है जितना इश्क़ हुस्न को ख़ुदा की खुदाई से है,
फिर ये बात अलग की दुनिया की नज़रों में इश्क़ हकीक़त में हो या हो ख्वाब में - दोनों में जुदाई बहुत है।

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