बुद्धजीवियों के मुँह से अक्सर सुना है मैंने की खाली हाथ ही आए हो और खाली हाथ ही जाओगे भी...,
बेशक, मोह माया के जाल से बाहर निकल कर संतुष्ट और सुकून भरा जीवन जीने का एक बेहतरीन मार्ग सुझाया है इन परम ज्ञानी ध्यानी लोगों ने..!!
मन मेरा जाने क्यों ये कहता है बारंबार कि कुछ तो होगा जो मेरे साथ आया है और मेरे साथ जाएगा...,
यूँ फिजूल में ही तो नहीं रचता कोई अपने ओंकार की टंकार और हुंकार से ये रसभरा मायावी जगत या सँसार..!!
माना जी माना, दिल से माना कि पूत सपूत तो क्यों धन संचय और पूत कपूत तो क्यों धन संचय...,
पर फिर ये राम रतन धन क्या है जिसे पाकर मीरा दीवानी हुई, कबीर हुए दास और बुद्ध हुए रत्नजड़ित हीरा..!!
मन मस्त हुआ तब क्यूँ बोले
हीरा पायो गाँठ गठियायो, बार-बार बाको क्यूँ खोले
हल्की थी तब चढ़ी तराजू, पूरी भई तब क्यूँ तोले
सूरत-कलारी भई मतवारी, मदवा पी गई बिन तोले
हंंसा पाए मानसरोवर, ताल-तलैया क्यूँ डोले
तेरा साहब है घर मांही, बाहर नैना क्यूँ खोले
कहै 'कबीर' सुनो भाई साधो साहब मिले गए तिल ओले
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