Sunday, September 25, 2011

THE DIVINE UNION


You want me..??
So do i...

but then
what's the need to cry...

Let's hug the day
you and i met
and
melted in each-other's eye...

forever
and ever and ever..
till
there wasn't any you
nor
there was any i...

Nothing
ya
absolutely nothing
but love
remained alive...

Yes
Yes
Yes
We did die...

Love now
soars in the sky...

Thank
Be grateful
Enjoy...
that
Life doesn't enslave us
NO
Life doesn't cage us
It just
let's us fly...

Into a world
where
THIS doesn't matter
where
THAT doesn't exist
where
YIN n YENG
need not multiply...

They got dissolved
in love
With love
they satisfy...

Love
thy name is
Life
and
Thy paired us
only to make us realize
that
We are indeed Ye
Come now
let's play n pry...

In this
game of love
called life
or
is it
the game of life
called love
no need to simplify...

Who cares
when
Fun is in the air
Who bothers
when
Fire is in the eyes
Yup
Gods need comply...




Saturday, September 24, 2011

दीन-ओ-ईमान के मसले-झगडे...



मेरा ईमान
मुझे बुतपरस्ती की इजाज़त नहीं देता
और तेरा दीन
हर कंकर में शिव-शंकर है कहता

अब

छोडो भी
ये दीन-ओ-ईमान के मसले-झगडे
क्या
दिल-ओ-ज़मीर हमारा
एक स्वर में
इश्कां रहने को नहीं कहता..??

शायद
मुझे ये जानने की जरुरत
के
हर सूरत में है उसी की मूरत
शायद
तुझे ये समझने की जरुरत
के
हर सूरत नहीं उसी की मूरत

फर्क

इतना महीन
के
छूट जाए जो नज़र से
तो
इंसान, इंसान नहीं रहता..

तुम
याद दिलाओ मुझे अन-हल-हक की यलगार
मैं
दिखाऊं तुम्हे दुर्योधन का अहंकार
तुम
दिखाओ मुझे मंसूर का दमकता हुआ चेहरा
मैं
सुनाऊं तुम्हे रावण की अफ़सोस भरी चीत्कार

पर

ये सब कहने-सुनने, देखने-समझने से भी क्या होगा
के
इंसान मौकापरस्ती से सदैव परास्त है रहता...

सत्य
कहा-सुना या फिर देखा-समझा जा सकता अगर
तो
खुदाया शिव-शंकरो से लबरेज़ ना होता ये नगर
प्रेम
गर दिल में अकूत हो मगर
तो
हर सूं और हर शय में वही आता है नज़र

ईमान
या
धरम नहीं
मुझसे मेरा इश्क ये कहता...

उज्जैन १ - २ सितम्बर २०११ को सांप्रदायिक दंगो की आग में जला...
इस बार मुद्दा मस्जिद से लगी हुई दूकान में गणेश प्रतिमा को स्थापित करना बना

Wednesday, August 24, 2011

छपास की भूख




देख रहें है आप जनाब


ये छपास की ज़बरदस्त भूख

जो छाई हुई है मुझ पर

और

मेरे मुल्क के बाशिंदों पर !!

अप्रमाणित भ्रष्टाचारी

प्रमाणित भ्रष्टाचारी

के विरोध में उठ खड़ा हुआ है !!

अँधेरा खुद जैसे

मोमबत्ती जलाने को उत्सुक हुआ है !!

हर कोई

कैंडल मार्च में शामिल होने को

जैसे मरा जा रहा है !!

फोटो खिंचवाने को

जैसे वो

सर के बल दौड़ा जा रहा है !!

डर है उसे

की

इस मुहीम में

कहीं पीछे ना छूट जाए वो !!

positive

इस लहर में

कहीं negative सा

नज़र ना आ जाए वो !!

छिप-छिप कर खाने वाला

देखिये तो जनाब

किस शान से

खुलेआम

अनशन ओढ़ रहा है !!

और

दुराचारी कहला रहा है वो

जो शर्मसार हो

इस आन्दोलन से

अपना मुख मोड़ रहा है !!

चलो जी...

वजह कुछ भी हो

भ्रष्ट आज अपना ही

पुतला जलाने को

मजबूर तो हुआ !!

सत्य का

भले ही ना सही

अन्ना का तो वो

मशकूर हुआ !!

आएगा जी...

जरुर आएगा

फिर

वो दिन भी कभी

झाँकेगा झूठ

जब अपनी ही आँख में !!

जलेगा दीप

जब अपनी ही आँच से !!

होगा जी...

जरुर होगा

अपनी सीरत पर भी

शर्मिंदा वो कभी !!

तब तक

ये खेल-तमाशा ही सही !!

क्रिकेट में हार

तो

सड़क पर जीत ही सही !!

tv पर सनसनी

तो

अखबार में खलबली ही सही !!

जारी रहे...

गर ये जरुरी बुराई

यूँ ही आदतन

तो बुराई भी क्या है ??

चलता रहे...

ये सफ़र

यूँ ही दफ्फातन

तो बुराई ही क्या है ??

रहता नहीं

क्या हर शख्स

साधुता से पहले हरजाई है ??

जागने से पहले

हर पीढ़ी

थोड़ी-बहुत अलसाई है..!!

बस...

इसी श्रद्धा से

जिए जाता है 'मनीष'

सबुरी में

की.,

कभी तो दिखाई पड़ेगा

खुदा

हर इन्सान की

परछाई में...

आमीन

Friday, August 19, 2011

idealistic slogans about LOVE - LIFE - MORALS et al...

If you can dream big to de-corrupt an entire nation by holding fast-unto-death and by rallying with the mob to fight against corruption, then surely i can atleast give a fair trial to convert myself into an honest citizen...can't i?

Just as you are busy in fighting against the faceless corruption, i am busy in overcoming the shameless corrupt.

HaPPy peOple dO nOt trY tO maKe Others unHaPPy ; tHEy juSt shaRe tHEir beinG.

Life is to Live Lovingly.
..but some THINKERS are always on a MISSION ; searching for a REASON or PURPOSE behind life. Their mission turns their life into HELL.

When inside is free, the outside stops to be a limitation ; IT is then realise as wholesome part of the whole.

It is always our choice whether we want to live in Heaven or Hell....ALWAYS
Oh Yes !!
i said ALWAYS.

There ain't any RiGht or WrOng answers ; there are just answers.Those which fit our beliefs are considered RiGht and those which do not are termed WrOng.

SWEET RELATIONSHIPS happen when we become our own pillow ; when tired we relax on them, when sad we shed tears on them, when angry we punch them and when happy we hug them.

Love is all about brossing the pain barrier, leaving our comfort zone, living each moment dangerously and yet enjoying the life to the fullest.

it is always better to live life with love n ZERO EXPECTATIONS....it makes us self-sufficient and free from the OtHeR.
Then,
when our wishes get fulfilled ; we do not get filled with ego but with gratitude.

Loyalties and Trusts are never towards people.
They are always towards
F.U.C.K
that is
Freedom, Understanding, Care & Knowledge
for all you SEXY GUYS n GALS ;-)

This OVERWHELMING URGE to be LOVED n LIKED by ALL n SUNDRY & hence LOVING n LIKING others for a GAIN is what POLITICS n POLITICIANS all about.
Beware Jaani...

Flowering is not a successful DOING for a flower ; it is just a state of the plant ecstasy as gifted generously by mother nature - ditto with wilting too.
Man but, powered by his ego thinks that he is the DOER when in fact it is a happening born out of life's compassion for life.

It is very easy to read, write or forward idealistic slogans about LOVE - LIFE - MORALS et al...
The real challenge lies in implementing them in our day-to-day lives.

The river is  not there to impose its superiority over the rock...
The rock is not there to be a stumbling block for the river...
They are there in perfect harmony....creating music
but...,
LIFE IS AS WE SEE IT.

WHAT IS SO WRONG  WITH STAYING IN CONSTANT TOUCH WITH THE GROUND BELOW OUR FEET?
WHAT IS THIS HUMAN OBSESSION ABOUT ACHIEVING STELLAR HEIGHTS?
IS THAT PROGRESS, GROWTH, EGO TRIP OR WHAT.....?????

To guard your image and that too in the eyes of the others is like guarding a goat from a butcher and that too in a slaughter-house.

ONly LOOSERS think in terms of non-existing competetion or rivalry between DAY & NIGHT ; LOVERS enjoy the two metaphysical forms of TIME...

Thursday, August 18, 2011

REALITY CHECK

A pessimist thinks
THE GLASS IS HALF-EMPTY

An optimist thinks
THE GLASS IS HALF-FILLED

A realist
JUST DRINKS...
:-)  ;-)  :-)

Thursday, August 11, 2011

Its TIME...

This blogpost is in response to ;

निर्णायक प्रतिरोध का समय


Source: चेतन भगत
Last Updated 00:28(11/08/11
 
हम सभी का सामना किसी ऐसे ‘अंकल’ से हुआ होगा, जो समय-समय पर हमें याद दिलाते रहते हैं कि इस देश का भगवान ही मालिक है। उनकी हर बात का लब्बोलुआब यह रहता है कि भारत एक भ्रष्ट और नाकारा देश है, जहां जिंदगी गुजारना मुश्किल है। वे हमें बताते हैं कि आरटीओ से लेकर राशन की दुकान और नगर पालिका तक हर सरकारी अधिकारी घूस खाता है। वे हमें यह भी बताते हैं कि कोई भी सरकारी महकमा ठीक से अपना काम नहीं करता।


गड्ढों से भरी सड़कें, खस्ताहाल सरकारी स्कूल, बीमार अस्पताल, ये सभी ‘अंकल’ की थ्योरी को सही भी साबित करते हैं। उनसे बहस करना कठिन है, क्योंकि वे गलत नहीं हैं। हमारे यहां सत्ता की तूती बोलती है, न्याय की आवाज दबकर रह जाती है, समानता का कोई नाम नहीं है। चाहे यह सब सुनने में कितना ही दुखद क्यों न लगे, लेकिन सच्चाई यही है।

लिहाजा, ‘अंकल’ अपना राग अलापते रहते हैं कि इस देश का कुछ नहीं हो सकता। ऐसा लगता है जैसे उन्हें इस बारे में कोई भी शक नहीं है। निराश ‘अंकल’ हमारी हर चीज पर संदेह करते हैं और बुराइयों को उभारकर सामने रखते हैं। यदि कोई व्यक्ति देश को सुधारने का बीड़ा उठाता भी है तो वे यह घोषणा कर देते हैं कि उसकी हरकतों के पीछे कोई ‘गुप्त एजेंडा’ होगा।

यहीं पर ‘अंकल’ गलती कर जाते हैं। एक गंभीर गलती। क्योंकि समस्याएं गिनाना एक बात है और समस्याओं को सुलझाने के लिए अपना जीवन दांव पर लगा देना दूसरी। साफ-सुथरे समाज की चाह रखना एक बात है और समाज को सुधारने का प्रयास करने वालों की नीयत पर शक करना दूसरी। सिनिसिज्म या निराशावाद कोई तर्क नहीं है, वह एक रवैया है। क्योंकि तथ्य यह है कि देश में आज भी अच्छे लोग हैं। सरकारी दफ्तरों में भी कुछ अच्छे लोग हैं। समस्या यही है कि उनकी आवाज को दबा दिया जाता है।

मुझे पूरा भरोसा है कि यह कॉलम पढ़ने वालों में से अधिकांश लोग ‘अंकल’ की तरह निराशावादी नहीं हैं। क्योंकि ‘अंकल’ तो अखबार को रद्दी के ढेर में फेंक देंगे और कहेंगे कि इस तरह के फिजूल कॉलम से कुछ भी नहीं हो सकता।

मैं आपको कोई कारण नहीं गिनाना चाहता कि हमें अन्ना का समर्थन क्यों करना चाहिए। यह अन्ना की गरिमा के साथ अन्याय होगा कि उन्हें अपने लिए समर्थन की याचना करनी पड़े, जबकि वे एक भ्रष्ट सरकार के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।

मैं आपका ज्यादा समय लिए बिना कुछ तथ्यों को दोहराना चाहूंगा। अन्ना ने अप्रैल में अनशन किया, जो जल्द ही एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन बन गया। चिंतित सरकार ने एक प्रभावी लोकपाल बिल बनाने पर सहमति जताई, आंदोलनकारियों के साथ हाथ मिलाया और सैद्धांतिक रूप से अन्ना के संस्करण पर राजी हो गई। तबसे लगातार सरकार अन्ना की टीम का अपमान कर रही है। उसने उनके मसौदे को एक तरफ पटक दिया और अपना स्वयं का एक मसौदा बनाया, जो कि लगभग निर्थक है।

सरकार संसद में जो मसौदा प्रस्तुत कर रही है, वह भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाएगा। महज 0.5 फीसदी सरकारी अधिकारी इसके दायरे में आते हैं। हमारी भ्रष्ट राशन की दुकानें, आरटीओ, पासपोर्ट दफ्तर, पंचायतें और नगर पालिकाएं इसके दायरे में नहीं आएंगी। प्रधानमंत्री तो खैर लोकपाल से परे हैं ही। क्या आपने कभी किसी लोकतंत्र में ऐसे भ्रष्टाचाररोधी कानून के बारे में सुना है, जो केवल कुछ खास लोगों पर ही लागू होता हो?

सरकार हमारी आंखों में धूल झोंक रही है। वह समझती है कि देश के लोग निरक्षर हैं और वे दोनों मसौदों का अंतर नहीं समझेंगे। बहरहाल, यह कॉलम पढ़ने वाले सभी लोग साक्षर व प्रबुद्ध हैं और वे सही-गलत का भेद समझते हैं। वे जानते हैं कि उन्होंने अपना पूरा जीवन भ्रष्टाचार से संघर्ष करते हुए बिताया है, लेकिन वे यह नहीं चाहते कि उनके बच्चे भी इसी तरह का जीवन बिताएं।

हो सकता है एक लचर लोकपाल से हमें आज कोई नुकसान न हो, लेकिन कल हमें इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा, जब हमारे बच्चों को कॉलेज में सीट नहीं मिलेगी, जब अस्पतालों में हमारा ठीक से इलाज नहीं किया जाएगा और जब हमारा कोई जरूरी काम सरकारी फाइलों में अटककर रह जाएगा।

हम एक गरीब देश में रहते हैं। गरीब इसलिए नहीं कि हममें अमीर बनने की क्षमता नहीं है, बल्कि इसलिए कि हमारे नेताओं ने हमें निराश किया है। हमने उनके हाथों में जरूरत से ज्यादा सत्ता सौंप दी, इसलिए उन्होंने हमारे वोट को चोरी करने का लाइसेंस समझ लिया। उन्हें उत्तरदायित्व से घृणा है, लेकिन उत्तरदायित्व की भावना के बिना हमारा विकास अवरुद्ध हो जाएगा।

इसलिए अन्ना के बारे में हमारी व्यक्तिगत राय चाहे जो हो, हमें उनका नहीं, उनके लक्ष्य और उनके ध्येय का समर्थन करना चाहिए। सरकार चंद आंदोलनकारियों को कुचल सकती है, लेकिन वह पूरे देश को नहीं कुचल सकती। शांतिपूर्ण, ठोस और निर्णायक प्रतिरोध हर भारतीय का अधिकार है। सोमवार से हम सभी का एक ही लक्ष्य होगा: देश के भविष्य की रक्षा।

मैं सरकार से भी कुछ कहना चाहूंगा। आपको क्या लगता है, आप एक लचर कानून बनाकर हमारे गले में ठूंस देंगे? क्या अन्ना को कुचल देने से भ्रष्टाचार से निजात पाने की हमारी जरूरत भी खत्म हो जाएगी? देश में भ्रष्टाचार विरोधी भावनाएं अन्ना ने नहीं उपजाई हैं और अन्ना को कुचल देने से जनभावनाएं समाप्त नहीं हो जाएंगी। अहंकार और दर्प का परिचय देकर आप देश में अराजकता का खतरा उत्पन्न कर रहे हैं और अराजकता से निपटना टेढ़ी खीर होता है। जन लोकपाल कानून को लागू कीजिए, अभी, इसी वक्त। प्लीज।

अंत में मैं जनता से कहना चाहूंगा कि यह ‘अंकल’ को गलत साबित कर देने का समय है। हकीकत ‘अंकल’ के निराशावाद से बड़ी है। गीता में कहा गया है कि जब पाप का घड़ा भर जाता है तो किसी न किसी को धर्म की रक्षा के लिए सामने आना पड़ता है। अब यह हमें तय करना है कि पाप का घड़ा भर चुका है या नहीं। और यह भी हमें ही तय करना है कि सड़कों पर उतरने का समय आ गया है या नहीं।


Ya...its Time

 Dear Chetan,


The so called "UNCLE" would feel ecstatic if he is been proved wrong on the state of affairs as it is among so called "INDIANS" when it comes to corruption.

You are very right when you write that - " A few activists standing tall against corruption can be stomped by the government but the government cannnot crush the whole of countrymen if they decide to stand agains rampant corruption."

I go by the same logic to say that - " The system can certainly nab a few corrupt individuals who indulge themselves in corrupt practices but the system cannot run down itself as a whole if majority of the components have perversely decided to stay corrupt."

Peep into the day-to-day lives of these staunch activists ready to lay their lives for a cause and you will know that their determination to do so comes from their strong dedication to lead an austere and corruption-free life themselves.

As Jesus would have said - " Let him, who indulges not in corrupt practices in his private and personal life, be the first one to throw stone on them who are indeed corrupt."

Just as you do not make an army of cowards, you do not build a movement against corrupt with the support of the corrupt - both are toothless.

Hope, the ever-hasty for result and ever-hungry for success young brigade of yours, of which you seem to be the chair-person would understand the values of building a house brick by brick.

Its Time to drench the brick in water to make it strong enough to bear the rough seasons or else it would be no better than the house of cards falling at the slightest hint, provocation or pretention of danger - fleeing and crying a la Baba Ramdev and his cohorts.

God bless the movement...

Yours truly,
manish badkas

Tuesday, August 9, 2011

कहते हैं की;

कहते हैं की;

" सत्य परेशान तो हो सकता है
पर पराजित कभी नहीं होता "

सवाल ये मगर

की

क्या वो सत्य पूर्ण-सत्य है
जो परेशान हो जाए ek lamhe को भी..??

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वो
खून बहाए
वो
दूध पिलाए
वो
पौरुष जगाये
कुदरतन...
वो
माँ भी
वो
पोषक भी
वो पत्नी-प्रेमिका भी
फितरतन...
और
तू..??

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भेजा उसे था ek फूल
वो गुलशन हो गया
दिया उसे था ek बोसा
वो चमन हो गया
जादू है ये
उसकी मस्त-निगाही का
क्या था मैं
और
क्या हो गया..??

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कश लगा
हर ek सांस पे
पी ले
प्राणों से प्राणों की हला
इश्कां हो  जा
दिल से
मिटा नकली
अक्ली affairs का सिलसिला
माशूका बना ले
मौत को
flirt बन तगड़ा
बीमे-शीमे
ke चक्कर छोड़
premium  का
लफड़ा है बड़ा
तू  मरेगा
दूसरा भरेगा
फिर claim  का
झगड़ा होगा खड़ा
तू मरे
और दूसरा मौज उड़ाए
ये कैसा दुखड़ा है पड़ा
बदले में
फोटू पे तेरी
रोज़ माला भी पहनाये तो
जैसे लगाता हो कोई
टाट में मखमल का थिगडा सड़ा
तू तो मर गया
और
उसका तो
न बाल बिगड़ा
न नाख़ून तक ज़मीन में गड़ा
खाली-फ़ोकट
मर-मर ke जीया तू बरसों
इससे तो
जी-जी ke मर जाता तू परसों
कमसकम
सेंक सकता न कोई
तेरी चिता पे
 यूँ दाल-बाटी
या
कबाब वाला टिकड़ा बड़ा
कहे 'मनीष'
शब्दों को चबा-चबा
सुन सके तो सुन ले
की ये कलाम नहीं सोने में जड़ा
लिखता है
अक्षरों को दबा-दबा
पढ़ सके तो पढ़ ले
की सच होता नहीं
किसी का भी सगा
हाँ मगर...
सत्य है अद्वैत

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दुःख है क्या
और
सुख है क्या
पता नहीं...
रंग है क्या
और
नूर है क्या
पता नहीं...
ज़िन्दगी है क्या
और
मौत है क्या
पता नहीं...
सपना है क्या
और
हकीकत है क्या
पता नहीं...
सच है क्या
और
झूठ है क्या
पता नहीं...
अपना है कौन
और
पराया है कौन
पता नहीं...
बस..,
इतना ही जानू हूँ
की
मुझे मेरा कुछ पता नहीं
फिर हूँ भी
की
नहीं भी हूँ
पता नहीं...

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तराशने चले
जो हम खुदको
दोस्तों की
अंदाज़-ए-नज़र से..,

जाना हमने
की
हज़ार जिंदगियां
भी नाकाफी हैं
'मनीष' तेरी मरम्मत को..!!

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दूसरों पर
दोष मढना
उतना ही आसान है
जितना मुश्किल है
खुद को
खुदा कहना . . . . . . . . !!

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kahun kise
और
sunta कौन है
लिखूं किसे
और
पढता कौन है
khoye हैं जो
kal की kal-kal में
aaj और ab से
unka रिश्ता कब है



Thursday, August 4, 2011

मैं और तुम

You & I

तुम हो
और
मेरे आस-पास हो
ये एहसास ही काफी है
तुम हो
और
मेरे अन्दर-बाहर हो
ये अंदाज़ ही काफी है
फिर तुमसे मुलाक़ात भी हो जाए
तो क्या बात है...
हो सकूँ गर में तुमसे रु-ब-रु
तो काएनात है...
महसूस कर सकूँ
गर दो जिस्मों को एक जान होते हुए
तो क्या बात है...
बाद मोहब्बत भरी मुलाक़ात के
गर रह जाए कोई तमन्ना बाकी
तो वाहियात है...
जान लो फिर की अभी बस
समझी-समझाई सी एक बात है
उतरी नहीं जो दिल-ओ-जान में
वो अधूरी बात है...
नाकाफी है
इश्क का एहसास अभी नाकाफी है...
कुछ है जो है अब भी तेरे-मेरे दरमियान
ये 'तेरे-मेरे' की पहचान अभी बाकी है...
पड़ा हुआ है अक्ल पे अभी झीना सा एक पर्दा
गिरना जिस परदे का मुद्दतों से बाकी है...
सोच-सोच कर हुआ जो राई से पहाड़
उस सोच की गिरफ्त अभी बाकी है...
तिल का ताड़ बनाये जो मन
तेरा उस मन का इश होना अभी बाकी है...
वो अभिलाषाओं की अभिलाषा अभी बाकी है...
तुम मैं और मैं तुम होना अभी बाकी है........!!

Thursday, July 28, 2011

साईं की हूँक


अफ़सोस..
ये नहीं,
की तुम मुझे समझ न पाईं...
अफ़सोस..
ये भी नहीं,
की तुम मुझे जान ना पाईं...
अफ़सोस..
ये,
की मेरी जान भी मेरी हो ना पाई...
बेशक..
कसूर मेरा ही है...
अफ़सोस..
के आज फिर मैंने अपनी जान है गवाई...
बस कर भाई..
बस कर..
कब तक तू
दूसरों से ही इश्क फरमाएगा...?
कब तक तू
यूँ ही अपनी जग-हँसाई करवाएगा...?
कभी तो.,
दिल-ओ-जान से इश्क लड़ा
तू
अपनी जान-ए-जाँ के साथ...!!
कभी तो.,
एक हो जा
तू
अपनी जानशीं के साथ...!!
चल अकेला-चल अकेला
की आज फिर साईं ने हूँक है उठाई...
बड़े दिनों के बाद.,
आज फिर मुझे अपनी ही याद आई...

Thursday, July 21, 2011

बेतुकी पत्रकारिता का दौर

दो कौड़ी का है तुम्हारा ये विश्वास
शब्द में ही निहित है देखो विश्व की आस
टूट जाता एक ज़रा हवा के झोंके से
रह जाती है केवल दिलों में फांस

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बेतुकी पत्रकारिता का दौर



घटनाओं का एकतरफा चित्रण मानवीय त्रासदियों को और भी गहरा कर जाता है I मानव इससे अतुलनीय संताप में डूब जाता है I


लगता है जैसे व्यावसायिक और वैयक्तिक हित पूरी मानवता पर इस तरह छा गए है की सात्विकता के पास
सिवाए आश्चर्य के इस तमाशे को देखने के और कोई चारा ही नहीं बचा है I पत्रकार और पत्रकारिता फिर अव्वल दिखने की इस होड़ से कैसे अछूते रह सकते हैं I लेकिन सवाल ये उठता है की ये पत्रकार क्या वाकई पूर्ण सत्य से नावाकिफ हैं या इन्होने जान-बूझकर एक लोक-लुभावन मुखोटा ओढ़ रखा है I अगर देश के स्थापित पत्रकार भी अपनी महती महत्वाकांक्षाओं के चलते आज सत्य का अधूरा चेहरा प्रस्तूत करने को बाध्य हैं तो देशवासी पिछलग्गू पत्रकारों से क्या उम्मीद कर सकते हैं I

मुझे ये बताइये जनाब की फिर ये सम्माननीय पत्रकार उन राजनीतिज्ञों से किस तरह अलग हुए जो लोक-मानस को लुभाने के लिए वही कहते हैं जो देश की जनता सुनना चाहती है I ये किस तरह की लीडरशिप है जो नेतृत्व करने के बजाए अनुसरण करती है जन-मानस की अवांछित भावनाओं का उनके वोट या नोट हासिल करने के लिए I जनता को तो फिर भी एक बार माफ़ किया जा सकता है उनकी स्वार्थी सोच के लिए पर इन प्रबुद्ध पत्रकारों का क्या कीजिये जो अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए अर्ध-सत्य परोस रहें हैं I

अगर से ये माननीय पत्रकार एक पल के लिए भी ये मानने को राजी हो जाएँ की इनका सत्य का ज्ञान अधुरा है तो फिर तो निश्चित रूप से कुछ बातचीत हो सकती है पर क्या ये सर्वज्ञानी इस तथ्य को जानने के लिए उत्सुक होंगे की सत्य हद, अनहद और हद-अनहद के बीच स्थित होता है ?

चलिए हम आशा का सहारा ले आगे बढ़ते हैं ये सोचकर की शायद पुरे हिन्दुस्तान में कोई १० प्रतिशत तो ऐसे पत्रकार होंगे ही जो पत्रकारिता के सही माईने पर सोच-विचार कर उसे अपनी दैनिक जीवन में लगन से अपनाना चाहते हैं I

अब हाल ही में हुए मुंबई बम ब्लास्ट और उससे जुडी पत्रकारिता की ही बानगी ले लीजिये I

हर पत्रकार, चाहे वो किसी भी समाचार-पत्र या न्यूज़ चैनल से सरोकार रखे हुए हो, सभी ने एक ही नारा बुलंद किया की "सरकार निकम्मी है, नाकारा है, लाचार है" I किसी भी समझदार पत्रकार ने ये कहने की ज़हमत नहीं उठाई की हम सारे के सारे भारतीय सामूहिक रूप से देश के इस हाल के लिए जिम्मेदार हैं I किसी ने भी देश की अनाप-शनाप जनसँख्या और उससे जुड़े तंत्र के लाचार मूकदर्शक बने रहने की मज़बूरी का पक्ष दिखाना जैसे उचित नहीं समझा I

आप ही बताइए क्या कोई भी माई का लाल छाती ठोंक कर इस १२१ करोड़ की आबादी वाले मुल्क की पल-पल, हर पल, हफ्ते के सात दिन या महीने के तीस दिन और साल के ३६५ दिन की समुचित सुरक्षा का जिम्मा अपने सर पर लेने का दावा कर सकता है? शायद ये पत्रकार बंधू ऐसा कर सकते हैं जो की इनके लेख पढ़ कर और इनकी सनसनी बातें tv पर देख-सुनकर महसूस होता है की हाँ....शायद ये पत्रकार ही अब हमारे देश के कर्णधार और माझी हो सकते हैं I तो मुझे लगता है की हमें तुरंत से पेश्तर देश की बागडोर इनके हाथों में सौंप देना चाहिए I शर्त सिर्फ इतनी सी हो की इनके देश के भगवान् होने के दौर में अगर एक भी बम ब्लास्ट हुआ तो इन्हें ना सिर्फ निकम्मा और नकारा करार दिया जाएगा वरन इनके हाथों से वो कलम भी छीन ली जाएगी जिसकी ताक़त के दम पर ये इस कदर इतराते फिरते हैं I

बहुत दूर जाने की जरुरत नहीं है हुजुर..., आप सब जानते हैं की आए दिन होने वाले घोटालों में मीडिया के दिग्गज किस तरह शुमार होते हैं I आप सब ये भी जानते हैं की खबर बनाने और बिगाड़ने की आड़ में ये पत्रकार किस तरह blackmailing के हथकंडे अपना कर पैसा और रुतबा हासिल करते हैं I अगर नहीं जानते हैं तो निकट भविष्य में कभी ना कभी जान ही जाएँगे I स्थानीय पत्रकारों की तो हालत और भी बुरी है I ये लोग तो छोटी सी छोटी खबर छापने की एवज में कुछ नहीं तो आपसे शीश झुका कर नमन के तो हक़दार खुद को मान ही बैठते हैं I हालत ये है की beaureau chief सब कुछ जानते हुए भी अनदेखी कर देता है I

तो फिर तर्क ये कहता है की ये पत्रकार होते कौन हैं समाज की तरफ से ठेकेदारी करने वाले अगर से ये अपना घर-दफ्तर ही ठीक से नहीं चला सकते? क्या हक है इन्हें किसी राहुल गाँधी, चिदंबरम या पृथ्वीराज चव्हाण की बयानबाजी पर सवाल उठाने का?

आप ख़ुफ़िया तंत्र को दोषी ठहराना चाहते हैं ये कह कर की वो ये बम ब्लास्ट किसकी कारगुजारी ये तक नहीं जानता? हुजुर क्या आप जानते हैं की आप के मकान से दस मकान दूर रहने वाले पडोसी के नौकर की बेटी के पति का नाम क्या है?

झवेरी बाज़ार, ओपेरा हाउस और दादर जैसी जगह पर जहाँ शाम ५ से ७ और सुबह ९ से ११ के बीच हर रोज इस कदर भीड़ पड़ती है जैसे कोई मेला लगा हो - छोटा-मोटा मेला नहीं कुम्भ का मेला I हर कोई घर पहुँचने की जल्दी में होता है I इतनी जल्दी में की आपको चलना नहीं पड़ता - आप धकियाए जाते हैं जनाब I ऐसी जगह पर ख़ुफ़िया तंत्र तो छोडिये जनाब हर तंत्र फ़ैल हो जाता है I शुक्र मनाइए के ऐसे बम ब्लास्ट ऐसे जगहों पर कमोबेश रोज नहीं होते - शायद इन आतंकवादियों में अब भी थोड़ा ज़मीर बाकी है I

गृह मंत्री का आप ये कहकर मखौल उडाना चाहते हैं की उन्हें आतंकवाद के बारे में कुछ पता नहीं I क्या आप आपके ऑफिस या घर में हो रही हर गतिविधि से वाकिफ रहते हैं? क्यूँ फिर आपके ऑफिस में गबन हो जाता है और क्यूँ आपके घर से एक कीमती घड़ी सहसा गायब हो जाती है? नहीं ऐसे सवाल कर आप गृह-मंत्री का नहीं अपना मजाक बना रहें हैं या हो सकता है की दर्शक-दिर्घा की वाह-वाही लूटने के लिए आपको ये बेवकूफी करना भी मंजूर है I

राहुल गाँधी को आप आंकड़ों में उलझाना चाहते हैं जबकी आप ये बखूबी समझते हैं की आपकी सचेत नज़रों और आपके cctv की वजह से आपके ऑफिस और घर में होने वाले ९९ प्रतिशत अपराध घटित होने से वंचित हो जाते हैं वर्ना तो मुम्बैय्या जबान में आपकी वाट लग जाए इ

प्रधानमन्त्री महोदय की सज्जनता को भी आप बख्शना नहीं चाहते हैं I एक सज्जन और सच्चा पुरुष सचमुच भोंचक्का ही रह जाता है अपने आस-पास फैले इस कदर झूठ और मक्कारी को देखकर, पर रहने दीजिये, आप उनके आश्चर्य को कभी ना समझ सकेंगे I आप खुद एक्सपर्ट जो ठहरे तमाम चालाकियों मे जिन्हें आप बड़ी कुशलता से व्यवाहरिकता का जामा पहना देते हैं I

आप, जो मेरी बातों को बकवास समझ-कह रहें हैं हुजुर, क्या आप खुद इस बकवास से परे हैं?

आप जो सरकार को अपनी गद्दी बचाए रखने के लिए सहानुभूति और करूणा का पाठ पढ़ा रहें हैं, क्या आप खुद सरकार के दायित्वों और उसके कार्यपालन को सहानुभूति से देख पा रहें हैं हुजुर?

तंग ही होना है तो पहले अपने-आप से और अपने इस अहंकारी मन से होइए श्रीमान I ये मन जो हर वक़्त दूसरों पर दोष मढने में लगा रहता है I

प्रासंगिक कीजिये अपने दिल को I

होश में आइये महाशय - होश में I

देखिये और दिखाइए वो जो है - परिकल्पनाएं बहुत देख और दिखा चुके आप I

वक़्त आ गया है कटु यथार्थ से रू-ब-रू होने का I

आमीन



आपका पाठक

मनीष बढ़कस

manish badkas

Wednesday, July 20, 2011

एक सवाल

यूँ तो...

कहने को

मैं भी कह सकता हूँ

की

नाखुश हूँ मैं अपनी ज़िंदगानी से

पर

कह दूँ अगर

तो

नाशुक्रा ना कहलाऊंगा

अल्लाह की बख्शी हुई उन नेमतों का

जो बरसाई है

उस रहीम-ओ-करीम ने मुझ पर

मुझे अपनी जान दे कर...!!??


एक सवाल है फ़क़त

यूँ दिल पर ना लीजिये

जवाब देने में यूँ वक़्त ज़ाया ना कीजिये

क्या पता कब निकल जाए ये अदना सी जान

बस...

ज़िन्दगी की अपनी यूँ तौहीन ना कीजिये 

Tuesday, July 19, 2011

Rapping against hope...


Yeah...
many a times i feel depressed and dejected to see life treat me the way it does...

but then...

i hear a cat crying unstoppably for her lost kittens...
She comes to me...
She looks into my eyes...
as if...
 she is asking me for some help...
i offer her milk...
She is not all that interested in quenching her hunger...
 but...
 still slurps the milk...
vow...vow...vow
She looks at me again and jumps out of the window...

The next minute...
 i hear her cry in the neighbourhood...
She is again in search of her lost kittens...
Soon...
She will forget all about her lost kittens...
and...
will be pregnant with fresh expectations from life...

My mind...
my mind too is almost like her...
it never stops expecting fairness from life in the name of HOPE...
Hope...
i have heard them say often...too often
 that hope is the biggest human strength...
but i...
yeah i...
in my life have found hope to be the biggest deterrent to stay happy...
Hope...
it frustrates you more than it keeps you happy...
yeah...
it gives you the feeling that you are in a soiled nappy...

i hoped to be successful someday...
but then...
what it actually meant was that i am a failure today...
which i am not...
yeah...i am not
How can the master create a failure...
if i am a failure he is a failure...
Is He not known to create masterpieces...
Each unique...in its own way...
Then...
why do i have to sulk if i am not Jesus...

To me...
The only challenge before us humans is to stay natural...
but hope...
which is a euphemism for our expectations and desires today...
have all but ruined our uniqueness...
yeah...today it is natural to be un-natural...
Sometimes...
but only sometimes...
i wonder as to what kind of life it would be for me...
and for that cat in me...
if we learn to live life without any hope...
yeah...so called hope...
Will it be less cruel on us...
Or...
Will it destroy us completely...
Will it be friends with us...
Or...
Will it hurt us frenetically...

Isn't hoping for the best from the future...
 like...
accusing the seed...
for its current tiny, ugly and unfruitful state with no meat...
Now...
Can the seed ever thrive to magnificence...
if it doesn't enjoy its being in the now&here...
all...
because of this added pressure of hope put by the mind...
and the society...
to be big, beautiful and a fruit of some significance...

Can...
future be a bliss if present is not accepted in totality...
Can...
present be a bliss if we keep on hoping from it mortality...

Is...
bliss just an imaginary phenomenon...
Can it be ever realised by a noumenon...

If...
future is unseen...
it can be bright / it can be dark too...
yeah..yeah..yeah
they term hoping for the best from the future...
 a positive attitude too...
but...
if the roots of this hope are in the non-acceptance of the present...
then...
rest assured that it is the root cause too...
for all the pain and the suffering that we undergo in the now & here...
Yeah...Yeah...Yeah
Right now - Right here

Oh God...
please help me to get rid of my mind's slavery....
Oh God...
please free me from this hoping gallery...
instead...
bless me with eyes of wisdom to see & accept life - as it is...
Oh God...
please grant me hopelessness from the other - sick it is...

i trust the YOU in me.