Monday, January 19, 2026

कैसे कह दूँ कि मुलाकात नहीं होती

अलसुबह, पूछा जो हमने उनसे ये सवाल की बताओ कैसे बीती कल की रात
तो 
पहले तो वो हौले से मुस्कुराए और फिर दांतों से होंठ काट कर चुप्पी थाम ली

समझ गया था मैं उनकी मधुर चुप्पी की वजह ठीक उसी वक्त
फिर वक्त काटे न कटा सारी सारी रात ये बात बिल्कुल अलग

जाने क्यों कुछ थके थके से नज़र आए मुझे मेरे सरकार
पता नहीं वक्त ने उनके साथ किए क्या क्या अत्याचार 

थकान मिटाने के लिए ही तो गया था मैं कल उनके पास 
सुना है इश्क़ से बेहतर होता नहीं किसी भी मर्ज का इलाज

प्रभु को भी थोड़ी चिंता लेने दो इस जगत और समाज की
सुना है हमने की महादेव से बेहतर है कोई काल का वैद्य नहीं

सबकुछ तुम ही तुम करोगे अगर तो भला हम क्या करेंगे
हमें और कुछ नहीं तो कम से कम तुम्हें प्यार ही करने दो
☕ कौनसा ऐसा घर है जहाँ हर दिन चाय नहीं बनती
कौनसा ऐसा घर है जहाँ चाय कहानियाँ नहीं बुनती

मखमली पोशाक में गुलबदन के मन को छूने के लिए...

लफ़्ज़ों को कहने का एक हसीन सलीका भी ज़रुरी है जनाब
गुलाब अगर कायदे से ना पकड़े जाएँ तो कांँटे चुभ जाते हैं बेहिसाब

~दीवाना वारसी 

Friday, January 9, 2026

शुक्र है शुक्रवार है

तुम हंँसती हो तो मेरी दुनिया खिल उठती है जानम..
😊🌹😊
तेरी एक मुस्कान पर कुर्बान कर दूँ मैं सारा जीवन..

पूछते हैं वो नाज़-ओ-अंदाज से की क्या बात है जी..??

बेबाकी से कहता हूँ मैं की...
वही बात है जो बरसों पहले उस बंगले की सीढ़ियों पर एक महीन मुस्कान, एक झलक, एक नज़र से शुरू हुई थी....

आज तक वो बात खत्म नहीं हुई है...

आज भी वही आग लगी हुई है...

जुम्मा था उस दिन..
शुक्र है की आज भी शुक्रवार है 
शुक्राने ख़ुदा के की सलामत हमारा प्यार है

हाँ जी हाँ *Teen* (किशोर अवस्था) में तेरी एक झलक पाकर ही हुआ मैं १३ *तेरा*

ना स्कूल-कॉलेज एक, ना डोली-बारात एक, फिर भी लगाते हैं आशिक़ अबूझ *फेरा*

अफ़सोस ये कि हम दो आशिक *तीन तेरह हो गए*

[मुहावरा: 'तीन तेरह होना' का अर्थ है 'बिखर जाना' या 'तितर-बितर हो जाना' (जैसे 'घर में सामान तीन तेरह हो गया')]

ताज़्जुब ये के आशिक़ फिर से दो जिस्म एक जान हो गए

शुक्र है ख़ुदा का की बात अब तक बनी हुई है
वर्ना हममें तुममें तो ऐसी कोई बात ही नहीं है

Yesssss......

तो Let's celebrate our home coming someday.. some night
 
दो सितारों का हो मधुर मिलन किसी दिन, किसी रात...

आमीन सुमआमीन

Thursday, January 8, 2026

Are you thirsty & hungry for Love with Love from Love..??

मेरे दिल में यूँ तो बहुत कुछ है
आप जो समझें वही सबकुछ है 
❤️‍🔥💘❤️‍🔥
आपके देखे से वो बहुत कुछ, नाकुछ भी हो सकता है,
मेरे देखे से मगर वो नाकुछ का होना ही तो सबकुछ है 
💔❤️‍🩹💔
बस..., यही तो उस नाज़नीन की सोच-समझ में हल्की सी एक चूक है,
वो नादान अंजान इस बात से कि हमें किसकी कितनी प्यास है, भूख है
 💕😘💕
मेरे एकमात्र सच पर भी उसे न जाने क्यों होता बहुत बार शक़ है,
क्या कहूँ, कैसे कहूँ......, की मेरे कहते ही सच भी हो जाता झूठ है
💎🌹💎
वो समझती है कि मैं उसकी बातों को, जज़्बातों को बिल्कुल भी नहीं समझता,
वहीं मैं भी ये समझता हूँ कि वो मेरे हाल को, हालात को कतई नहीं समझती
बस, यहीं से हम दोनों के बीच एक वैचारिक जंग शुरू हो जाती है...
लय-ताल जो जो एक मधुर मिलन के लिए मिली थी, खो जाती है... 
और ऐसा हादसा एक बार नहीं, कई बार, बार-बार होता है...
सोच-समझ की सुई फिर वहीं जाकर अटक जाती है जहाँ से जवानी को तुरपाई की जरूरत महसूस हुई थी
दो जिस्म, दो दिल बुनने चले थे जो रिश्ता वो लिबास खो जाते हैं, 
सीने चले थे जो तन मन धन को वो खुद ही ज़ख्मी हो जाते हैं,
साथ चले थे जो दो राही वो एक अलग ही राह अपना लेते हैं...
मंज़िल तक पहुंचने से पहले ही दो मतवाले रास्ते से भटक जाते हैं...
🤫🤐🤫
फिर वही तन मन धन की बेचैन प्यास तड़पती है, तड़पाती है,
बरसों पुरानी एक मनमोहक कहानी फिर प्यास बन तरसाती है,
एक फांस है जो चुभते ही नासूर सा एक ज़ख्म बन जाती है,
वक्त उस दर्द को बहला-फुसला कर एक आशा जगा देता है,
एक उम्मीद की किरण उस प्यार के दर्द को मीठा बना देती है,
मनी फिर अपनी प्यास बुझाने के लिए निकल पड़ता है किसी कस्तूरी की तलाश में,
कस्तूरी फिर मचल उठती है मनी की भूख-प्यास को तृप्त करने के लिए...

"कस्तूरी कुंडल बसै, मृग ढूँढे बन माहि। 
ऐसे घटि घटि राम है, दुनिया देखे नाहीं।।"

(कस्तूरी कुंडल बसे मृग" एक प्रसिद्ध कबीर दोहा है जिसका अर्थ है कि जिस तरह कस्तूरी हिरण अपनी नाभि में स्थित कस्तूरी (सुगंध) को जंगल में ढूंढता फिरता है, उसी तरह मनुष्य भी ईश्वर को बाहर मंदिरों और तीर्थों में खोजता है, जबकि वह हर कण में उसके भीतर ही मौजूद है, जिसे उसे अपने अंदर झाँक कर खोजना चाहिए, यह दोहा हमें आत्म-खोज और आंतरिक ज्ञान के महत्व को सिखाता है)

Aameen summa aameen