Monday, November 15, 2010

क्या करूँ..?



तेरे होते क्या हो सकता है मुझे..?
तेरी दुआओं की चादर चढ़ी हुई है मुझ पर..
कोई मुझे छु कर भी छु नहीं पाता,
और तुम..!
तुम मुझे बिना छुए ही पूरा कर देते हो..

समझ नहीं पा रहा फिर भी  की क्या करूँ मैं अपने साथ..?
ये करूँ,  वो करूँ या फिर कुछ ना करूँ मैं अब अपने साथ..?

ये करूँ तो वो नाखुश,  वो करूँ तो ये नाउम्मीद..
किस-किस की  हसरतें में पूरी करूँ,
जो  मोहब्बतन  लग गयीं है अब अपने साथ..

कुछ ना करने की जो मैं कर लेता हूँ ज़िद,
तब भी तो कुछ ना कुछ कर ही  लेता हूँ ना मैं अपने साथ..?

या खुदा..!
तू ही बता की अब मैं क्या करूँ..?
एक तेरा ही साया तो है जो अब है अपने साथ..

क्यूँ ना ख़त्म कर लूँ मैं अपने आप को..?
जब तू ही तू रहता  है हर वक़्त बस अब अपने साथ..

तौबा कर लो इस मैं की मय से
वो कहता है 'मनीष',
बका से बेहतर  फ़ना है
जो कर सको तुम अपने साथ..

[बका = sacrifice, फ़ना = dissolution]  

5 comments:

  1. aas paas hai khuda to phir prashn kaisa ? bas khudi ko ker lena hai buland ......

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