Friday, June 24, 2011

WOMEN LOVE DOGS

http://youtu.be/qK3pUwC2QGw

Click the link above to listen & watch the "Kutta सोंग" from Bollywood flick - प्यार का पंचनामा


मैं " पति " हूँ
का ख्याल
है उनपर कुछ इस कदर भारी
चाहते हैं वो मुझसे "कुत्तों" सी वफादारी...!!!

शादी शुदा हूँ तो क्या हुआ
हूँ तो इंसान ही
अब कहाँ से लाऊं में ये दूम हिलाने की समझदारी...!!!

लुत्फ़ ये..,

के पुछा जो मैंने इन कुत्तों से
की क्या है बे तुम्हारी इस बेपनाह वफादारी का सबब
तो वो जोर से भोंक कहने लगे
की ये तो है बस पापी पेट की लाचारी...!!!

वर्ना तो..,

हम कुत्तों के समाज में होती ही नहीं भैय्या  
ये शादी की खुजली वाली बिमारी...!!! 

एक ज़माना  हुआ
इंसान को दूम से जुदा हुए
अबकी तो लगता है
आ गई  है सर कटाने की बारी...!!!

वफ़ा को होती है
एक अदद मालिक की दरकार
इश्क ही जब याँ मालिक
तो फिर भला
 बेवफाई है किसकी जिम्मेदारी...!!!

वफ़ा गर बँट जाए हिस्सों में
तो वफ़ा ना रहे
इश्कां मगर रखते यहाँ
खुद को बाखुदा कलम कर लेने की तैयारी...!!!

वफ़ा और इश्क के
सबके अपने-अपने अलग और जुदा माईने हैं जनाब
इधर वफ़ा इश्क से है
तो
उधर वफ़ा से इश्क की बिमारी...!!!


Man is bad case....isnt it?

Sunday, June 19, 2011

POSTMARTEM

कहते हैं वो
की
बाल की खाल निकालते हैं 'मनीष'
कहते हैं हम
की
क्या करें - पेशे से कसाई जो ठहरे
फर्क सिर्फ इतना
की
वो जान निकाल लेता है
और
हम ज्ञान...!!!

Listed below are select examples of how the postmartem of forwarded messages, currently doing the rounds in the mobile circuit, is done. The postmartem appears to be heartless but in fact, it is done to gain an insight as to how cunningly our mind works. The messages in RED are the one sent by people who are in total unanimity with their minds while the ones in BLUE come straight from the heart or a No Mind state.

Enjoy reading them but do not forget to learn a trick or two to identify yourself seperate from your thought process.
Read mindfully to get the meaning but then step out to read your own mind.
Allow your heart to rule your self.

A little water evaporates with the Sun heat,
But,
Oceans never go dry...
Limited responsibility tires you...
But,
Unlimited responsibility empowers you...

Response:

It is this little evaporation of the Ocean by the Sun that keeps on empoearing the Ocean with gallons of River water.
Man,
but
fears evaporation and hence dries up.

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True Quote :
If silence is considered to be the best for all situations..!!
Then,
Why do we all get so hurt whenpeople don't talk to us..!!

Response :

Slavery, either of the spoken word or to the silence,
is
but a slavery...
Freedom is Bliss.

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मैंने अपने दिल से पुछा:
"प्यार और दोस्ती में क्या फर्क है..??"
आवाज़ आई...,
"मेरा काम blood  supply  करने का है,
ये छिछोरी बातें मुझसे न किया कर."

Response:

जब भी सवाल किया धड़कते हुए दिल से,
जवाब मन ने ही दिया...,

तसल्ली से
खामोश बैठ
सुन पाते कभी धडकनों की भी ज़ुबान,
ये हुनर कभी तराशा ही नहीं..!!

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"Peace of mind can be attained very easily if we just LET GO 3 C's of
CRITICISING OTHERS
COMPARING WITH OTHERS
&
COMPLAINING ABOUT OTHERS...."

Response:

Very TRUE...
But,
Would you not CRITICISE a thief for his indulgence in theft...??
Would you not COMPARE to distinguish between a rose & a thorn...??
&
Would you not COMPLAIN against the atrocities of a criminal mind...??
It ain't about LETTING GO something
but
about ACCEPTING everything equanomously as it comes
&
then choosing to act as per the demand of the situation.
The catch is that one has to be alive & awake to each & every moment of the day to be able to take an informed choice.

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Negative thinking is as important as positive thinking
Coz
If positive thinking invents an aeroplane
then
Negative thinking invents parachute.

Response:

True again...
But then a terrorist can make a mockery of the positive invention of an aeroplane..
while
a fearful negative mind can make a mockery of the life saving parachute by pressing wrong buttons..
Because a parachute can save life - it is a positive invention done keeping the negative fallout in mind..
&
Because an aeroplane can kill - it is a negative invention done with positive frame of mind..
ALL in ALL 
           " बन्दर के हाथ में उस्तरा देने के परिणाम कुछ भी हो सकते हैं "

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वो नसीब थी मेरी
जो मुझसे खफा हो गई
दूर मुझसे न जाने क्यूँ
बेवफा हो गई
इंतज़ार है उसके पैगाम का
पता तो चले वो किस पर फ़िदा हो गई.......???

Response:

वफाओं-जफ़ाओं पर यूँ मरने वाले
कभी इश्कां न हो सके
उलझे रहे जिस्मों में
रूहां न हो सके
आज़ादी को समझा किये वो मौत
पंछी ये आकाश के
कभी शम्मा के परवाने न हो सके.........!!

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THOUGHT FOR THE DAY :

Never allow someone to be your priority while allowing yourself to be their option.

Response:

People never are a priority or an option for true lovers ; love is.


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Life is better WHEN you are happy
Life is at its best WHEN others are happy bcoz of you
Be inspired
&
share your smile with everyone.

Response:

A life full of bliss is never dependent on IF's, WHEN's and BUT's.

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विष भरा अमृत घटाओं में
है जलन सी छाँव में
फिर वफ़ा ने मात खाई
बेवफा के गाँव में
चल रहे थे साथ दोनों
रहगुज़र भी एक थी
अब अकेले ही खड़े हैं
ज़ख्म लेकर पाँव में....

Response:


हम रहते हैं वहाँ
जहाँ कोई आता-जाता नहीं...
ना कोई विचार
ना कोई सवाल
ना कोई जवाब
बस..एक खूबसूरत सा एहसास है
की
जो भी इस दुनिया में है
वो प्यार का ही रूप है
और
प्रेमी करते हैं
प्यार का हर रंग स्वीकार...
चाहे धुप हो या छाँव
चाहे पिहू की पियु-पियु हो
या हो कौव्वे की काँव-काँव...

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Wednesday, June 8, 2011

ना

ना मंजिल है
ना मुश्किल है कोई ज़िन्दगी में.....
ना हम होते हैं
ना तुम होते हो कोई बन्दगी में.....
बस एक ज़िन्दगी है
जो भरी हुई है बन्दगी से.....
दर्द और ख़ुशी
के पार भी है एक जहाँ..,
ना मनवा है
ना मानव है कोई वहाँ ज़िन्दगी में.....
बस तारी है
एक एकात्मकता का एहसास इस द्वन्दगी में....
जैसे;
खिल आया हो कोई कमल गन्दगी में....
जैसे;
गाए कोई मल्हार तिश्नगी से.....
जैसे;
लिपटा कोई भुजंग सन्दगी से.....
जैसे;
मस्त कोई मलंग अपनी कलन्दगी में....
जैसे;
करे मनीषी होश रिन्दगी में.....
जैसे;
करे कोई मजाक सन्जीदगी से....
जैसे;
खेले 'मनीष' ये खेल खिलन्दगी से.....


Monday, June 6, 2011

कौन हूँ मैं...???

कौन हूँ मैं...???

" मैं " वाकई में कुछ भी नहीं...,
यह " कुछ भी नहीं " का एहसास क्या है मगर..!!
कुछ तो है........
जो
ना-कुछ और सब-कुछ के ठीक बीचों-बीच है...
लगता है ये ना-कुछ ही सब-कुछ हुआ है
कुछ ना कुछ हो कर...

ये माना की मैं कुछ भी नहीं..,
पर यह भी तो हो सकता है
की
मैं ही सब-कुछ बन गया हूँ
ना-कुछ बन कर..!!

मस्त रहना चाहता हूँ मैं
ज़िन्दगी की हर जंग में..,
डूबे रहना चाहत हूँ मैं
इश्क के हर रंग में..,
क्या करें मगर..
की
जीने का ये अंदाज़ जिन्हें नहीं बर्दाश्त
ढाल लेना चाहते हैं वो मुझे
अपने ही ढंग में....

कोई समझाए उन्हें की हम बताएँ क्या
की...,

तंग नहीं है इस क़ाएनात में कहीं भी कुछ भी...
ज़िन्दगी की हर अदा यहाँ निराली है...
कुछ भी तयशुदा नहीं यहाँ
और फिर भी इतना तो तय है
की...
उसे समझ लेने का दम भरना
एक प्रकार की गाली है...

बस...
इतना ही कहिये जनाब
की...,
गज़ब यहाँ उसकी हर अदाकारी है...

जैसे ;

दूरियां ख़त्म करना चाहो
तो ख़त्म हो जातीं हैं नजदीकियां भी,
सुख ही सुख चुनना चाहो
तो हासिल होते हैं दुःख भी,
ठीक उसी तरह ;
जैसे जन्म ले आता है मौत अपने संग में...

नहीं...नहीं जनाब...!!
हम पे यूँ तोहमत ना लगाइए
बस,
थोड़ा अपने-आप पे गौर फरमाइए...

ये अल्फाज़ जो निकल रहें हैं दिल से
ये कोई ताकीद नहीं
और
ना ही कोई नसीहत है
ना ही कोई फरेब है इनमें
और
ना ही कोई हक़ीक़त है इनमे  
बस...
छाया है उसकी...
जो ढलता...,
या शायद ढलती...,
या शायद दोनों ही..,
या शायद कुछ नहीं...,
या शायद सब-कुछ....,
पता नहीं.......
बस इतना ही जानूँ
की
ढले ही नहीं वो किसी भी रंग में......
हाँ...ये बात और
की
हम ढल सकते हैं उसके ही रंग में.........

दूसरों को उसके रंग में ढालने का
कोई ठेका भी नहीं ले रखा है हमने...
की
यहाँ कोई दूसरा है ही नहीं
- सिवाय उसके.....

ना ही हम कोई चालबाज़ राजनीतिज्ञ
और ना ही हम कोई गुरु-घंटाल हैं...
जो भीख मांगे वोट की सम्मान की गरज से
या मांगे आस्था कुछ पाने की लरज से...
की
यहाँ कोई सम्मान योग्य है ही नहीं
- सिवाय उसके.....
और ना ही कुछ पाने योग्य है
- सिवाय उसके.....

और ये भी
की

ना ही दूसरों को ज्ञान-ख़ुशी-प्रेम बाँट
उन्हें अपना गुलाम बनाने में हमें कोई लुत्फ़ है...
की
यहाँ ना कोई ज़ाहिर ना बातिम ना ग़ालिबन लुत्फ़ है
- सिवाय उसके.....

दूसरों से character certificate वो मांगे
जिसका अंतस में character ढीला है...
की
यहाँ कोई character है ही नहीं
- सिवाय उसके.....

तो

फिर ये हंगामा क्यूँ मचा रखा है 'मनीष'.....??
क्यूँ ये बेसिर-पैर की शेर-ओ-शायरी.....??
क्या ये है कोई लाचारी......??
या फिर है ये कोई लाईलाज बिमारी......??
तो
जवाब ये है मियाँ
की
पता नहीं.......

पता नहीं क्या है ये...
पर बड़ी मस्ती है इस रंग में
आ जा, डूब जा तू भी मेरे संग में...


हाय...मैं मर जांवा तेरी इस हँसी पे
हाय...मैं कुर्बान तेरी हर ख़ुशी पे
आँखें नम हैं देख ये मस्तियाँ
हाय...मैं निसार अपनी ही बेख़ुदी पे...
बस इतना समझ लीजिये

की...

वक़्त ही मेरा पता देने लगा है अब तो
सफ़र ही मंज़िल का मजा देने लगा है अब तो
हर कदम उठता है अब तेरी ही जानिब
कतरा ही सागर होने लगा है अब तो.............



Wednesday, June 1, 2011

मिज़ाज

ये वफ़ा-ओ-जफा के किस्से कब तलक
कब तलक ये इश्क-ओ-मुश्क की बातें
कब तलक जी सकता है कोई यूँ बँट-बँटकर
ये फरेब-ओ-हकीकत के फ़साने कब तलक
कभी तो उठा ये तेरे-मेरे के परदे
ये इसका और वो उसका के दुखड़े कब तलक
कब तलक रखोगे दूरियाँ ज़मीन-ओ-आसमान के बीच
ये मिलने-बिछड़ने के सिलसिले कब तलक
कब तलक यूँ 'कब तलक - कब तलक' करते रहोगे तुम "मनीष"
ये शोर-ओ-गुल, ये चीख-ओ-पुकार, ये सन्नाटे कब तलक

मान क्यूँ नहीं लेते तुम
की
ऐसा है तो ऐसा ही सही है
क्यूँ जिद पर अड़े हो
की
ये सही है और वो गलत
शायद...,
आँखों पर मन का कोहरा अभी घना है
इसलिए तवज्जो है उसपर जो हासिल-ए-फ़ना है

वाह जनाब वाह !!
बस अब इतना और बताने की मेहरबानी कीजिये जनाब
की ;

सुख-दुःख क्या वो भेजता है....??
क्या हम ही उन्हें नहीं बुला लेते अपने कृत्यों से....??

अगर ऐसा है तो फिर आदर कैसा और किसको मिलना चाहिए....??
और गरचे ऐसा नहीं है तो स्वीकार किसका होना चाहिए....??

क्या उसका जो है ही नहीं....??
या उसका
जिसे जीतें हैं हम हर पल
जो महसूस होता है हर लम्हा....??

जो है कोई जवाब
तो
जवाबदारी भी लीजिये जनाब
सुनी-सुनाई धारणाओं से बहल जाएँ
ऐसे बचकाने नहीं हमारे मिज़ाज

जानता हूँ मगर
की..

हाक़िम मेरा खुद ही मरीज-ए-इश्क है
वो इस मर्ज को क्या दुरुस्त करेगा
उल्टा मुझे भी इश्क में खुद सा बर्बाद करेगा
और जो हुआ वो हस्ती का शौक़ीन
तो मस्ती को मेरी बर्बादी कहेगा
मुझे तलाश है अपने तई किसी सूरज की
जो
रोज़ उठाया करे मुझे मेरे ख़्वाबों-ख्यालों से
की
आँख खोले से भी जब नज़र आए वो ही सामने
तो
ख़्वाबों और ख्यालों में कोई गफलत न बचे
हर ख्व़ाब ख़याल और हर ख़याल हकीकत लगने लगे
हाँ...
इतना उठाये वो मुझे
की
झमाझम बरस पडूँ में
प्यासी धरती पर
काले-काले बादलों की तरह
हाँ...
इतना बरसे अब्र-ए-इश्क
की
एक हो जाएँ
ये ज़मीन-ओ-आसमान...


Tuesday, May 31, 2011

पिचकारी

होश के फूल खिलना हैं जारी
मदहोशियों से छूटती जातीं हैं यारी...

खौफज़दा थे कभी मेरे हर कदम
अब तो मस्ती का आलम है तारी...

मुझमे और मेरे ख्यालों में अब वो दोस्ती न रही
हाँ...फासलों से मोहब्बत है बादस्तूर जारी...

हसरतों में दामन उलझाने की आदत भी अब जाती रही
क्या करें...की इश्क का जूनून है सर पे भारी...

मुझे फ़क़त मेरा बदन समझने की भूल न कर, ए गुलबदन
मैं वो शय हूँ जिसकी अक्ल गयी है मारी...

आती-जाती सांसें यूँ ही रुक जाएँगी दफ्फतन
लाख करलो तुम ज़िन्दगी की तरफदारी...

खामोश बैठ देखता हूँ अब मैं सब-कुछ
बेहिसाब है यहाँ उसकी कलाकारी...

अजब है ज़माने में उसकी कलाकारी
एक ही रंग से मारे हजार रंगों की पिचकारी...





Saturday, May 28, 2011

Limiting - a big stupidity

 LIVE IN LIMITS - लिमिट में रहो !!


Look...
how man sees this world
is his perception...
He sees not what  IT IS
but sees what his imagination is...

What appears as restless pedalling or struggle of a duckling is a natural effort on duck's part to stay afloat....
What appears as calm, serene, peaceful demeanour of a duck is just a natural posture or probably a natural wait...
Man but., is known to think egoistically...
His mind, full of ego, does not allow him to find pleasure in plain and simple facts of life...
Simplicity seems like a curse to him.

He thinks happiness is bliss...
He thinks that happiness is dependent on a reason...
He thinks that happiness can be achieved...
He knows not that happiness, because it is dependent on a reason can never beget to become everlasting, unconditional and natural bliss.

Mind ; it keeps man always busy...
Mind ; it keeps him either in pain or in sorrow by employing a simple trick by making us either think of the past or by coaxing us to dream f that future which is not...
Time to wake up to the Now & Here...isn't it...??

Ideas & Dreams are undoubtedly a rich source of self-fulfillment...
But ;
Ideas & Dreams, when they are generated to earn only name, fame and money, fulfill us not...
They may fill our coffers but our emptiness they fulfill not.

Who would want his friends & relatives to die or cry when he dies or cries...??
But ;
Today that is what we exactly look forward in a relation...isn't it...??
A true friend, though, would like to see his friends & friendship blossom even when he is or he is not.

yeah...man loves to see his name flash on people's heart & mind through the media of TV, print, computer, etc. etc.
He is prepared to go to any lengths for that fifteen minutes of fame...
Ya...He doesn't even mind stealing...
The easiest way is to type your name below a forwarded text message. 
But ;
Is it the name or the message for which he stood or stands for which should be remembered...??

A man is indeed a failure in the Now&Here ; if he thinks that he will be a success someday.
Success&Failure are indeed twin-faces of the same coin called LIFE...
But ;
LIFE is beyond the constraint of the two.

The limitless is beyond any circumference...
That man chooses to limit himself to a certain pedigree is the biggest insult that man causes on himself.
Yes...
Limitlessness indeed appears to be a big stupidity to the the genius
but ;
only till such time the genius finds himself to be an integral part of the limitlessness...

Why am i wasting my energies to negate the negative, especially, when i know that the negative gets further charged up with positive negation...???
Because ;
i am a stupid who adopts stupid ways to create something out of this negativity.

i know...i know
Lectures & Lecturers have a certain limit beyond which they are useless
But ;
Lessons & Life are teachers that teach you of beyond limit.

OK...OK
So, now you want me to Shut Up for once & all...
But why..??
Because ;
My words your authenticity & your being...!!
Well...
i look at it as a sign of the spirit in you still being alive in spite of your consistent efforts to let your mind rule...

and so...
i won't stop...
Because ;
Man is a bad case....isn't it?

Saturday, May 21, 2011

क़यामत का दिन



एक और पहलु :

बकौल 'नीरज' ;
आदमी को आदमी
बनाने के लिए
जेब कफ़न में
लगाना चाहिए..........
और अब ;
ज़िन्दगी को ज़िन्दा
रखने के लिए
क़यामत का दिन
तय हो जाना चाहिए..........

हर दिन क़यामत सा लगे
ऐसा कोई केलंडर बनाना चाहिए..........

देख सकें हम अपनी-अपनी करतूत
ऐसा कोई आरसा बनाना चाहिए..........

बना सकें हम अपनी साँसों को घड़ी
ऐसा कोई कारख़ाना चाहिए...........

कर सकें हम अपना ही फ़ैसला
ऐसा कोई दिल दीवाना चाहिए..........

और तब...
तह-ए-दिल से कह सकेंगे हम 
की :

ले आओ क़यामत का दिन
हाँ ...
अब मैं तैयार हूँ...

पुकारो मुझे कुछ यूँ
की तोड़ कर सारी ज़ंजीरें
मैं तुममें समा जाऊं...

तुम्हारे-मेरे बीच की
अदम इन दूरियों को
हमेशा-हमेशा के लिए मिटा सकूँ...

लिपटा लो अपने से
मुझे तुम कुछ इस कदर
की मैं खो जाऊं...

ज़िन्दगी हो तुम मेरी
कोई पल-पल तड़पाने वाली मौत नहीं
जी लो तुम मुझे कुछ यूँ
की दुबारा मैं यहाँ लौट न सकूँ...

Thursday, May 19, 2011

शायद...



ये..
जो अधुरापन सा
मालुम पड़ता है
दो प्रेमियों को अपने बीच...
ये वो आधा आखर है प्रेम का
जिसकी बात कबीर करते हैं.....शायद

ये..
'शायद' इसलिए लगाया की
हमारे देखे से तो
कोई अधूरापन दीखता नहीं...
इस प्रेम के आधे आखर ने
खुद अधुरा रहकर
हमें पूरा कर दिया है......शायद

ये..
'शायद' इसलिए जोड़ा है शायद
की प्रेम अपने-आप में तो पूर्ण है
पर दो प्रेमियों को पूर्ण करने हेतु...
उसे खुद दो दिलों में
बँट जाना पड़ता है.....

नहीं..
इस बार कोई शायदगी
का दोयम एहसास नहीं रेख छोड़ा है प्रेम ने...
पूर्ण में से पूर्ण निकलकर
पूर्णता से
पूर्णता में
पूर्ण ही शेष रह जाता है.....
ये ही पूर्ण की शास्वतता है......शायद

अब..
ये वाला 'शायद'
फिर से इस करके रक्खा है मेरे आत्मन...
की ये सत्य
तब तक महज एक तथ्य रहेगा
जब तक स्वयंभू अनुभूत न हो जाए..................................!! 


Tuesday, May 17, 2011

THE MAN MACHINE


                                   http://youtu.be/ZekZiuV6qmA

Peaceful co-existence of the opposites that we see thriving and flourishing in the nature is often confused with the dreadful adjustment or compromise that is so very rampant in human relations.

The rose blossoms not inspte or despite of thorns presence but because that is its pre-destined nature. The rose considers not itself a rose neither does it tags itself as the king of flowers.

The rose compares not itself with the thorn - not because it is egoistic or ridiculous to do so but because the rose, just as a thorn does, completely lacks the capacity to distinguish one from the other.

This inability of the rose and the thorn to differentiate makes them naturally true to their nature but then it also keeps them devoid of the feeling of bliss or of any feeling for that matter.

The rose and the thorn are indeed two different entities but then they being part of the same shrub, and that shrub being one eternal part of the limitless garden called life and hence blissfully united in their diversity, is a fact that this rose and thorn will never get to realise.

But then, have not this fact lost its value in the most intelligent species of the planet Earth......??

Each part of this endless universe, but for humans, plays its role to perfection. Every part accomplishes the duty that is been ascribed to it by mother nature without even a hint of superiority or inferiority complex.

Humans, because they have been provided with super-natural powers to think, judge and choose are not pre-destined. Their free-will makes them free of any super-imposed destiny but for that destiny that homo-sapiens themselves choose for them. Humans, hence are not slaves to anybody in this cosmos but for their own sweet will.

This free-will is at once a boon and a curse depending on what choice humans par-take.

The overwhelming pain and suffering that humans go through today is resultant to the egoistic or self-centered choices that humans have indulged into.

The picture is not so rosy but is thornful so far...

It is so, because humans have readily allowed their minds to rule over everything else in this nature.

Every human being is personally responsible for the state that he lives in.

Hitherto, humans, barring a few exceptions here and there, have collectively proved themselves to be a bad case. The society is as good or bad as an individual is because a society is nothing but a group of individuals and even if a single unit is cancerous in nature the whole body is bound to suffer.

Each and every man and yes...YOU are included, has to accept that it is only him who is responsible for the heavenly or hellish state that he is currently in.

Man, till the time he takes not the onus on himself to change will continue to remain a bad case.

It is time to heal self.

read more about this man and his journey at
MAN IS BAD KASE
at
http://manisbadkase.blogspot.com/

Ameen    

Saturday, May 14, 2011



ये..
प्यार को दोस्ती से
अलहदा कर देखने वाले...
ये..
साँसों को धडकनों से
जुदा समझने वाले...
कहना असल में
ये
चाहते हैं शायद...
की
वो हैं बस..
खुद को जिस्म ही जिस्म जानने वाले...

मान लेते हैं जब ये
खुद को
फ़क़त एक मिटटी का पुतला...
मांगने लगते हैं
दौलत
हुस्न-ओ-शबाब की
खुद से किस कदर बेगाने हो जाते हैं
ये..
नाज़-ओ-अदा पे इतराने वाले...

दीवाना हो जाए
जब कोई
इनके हसीन रुखसार का...
तो
बेशर्म और काहिल कह
दिल ही दिल में
मुस्कुराते हैं
ये..
पर्दों से बेपनाह मोहब्बत करने वाले...

रक्खूं जो नियत पाक-साफ़
और
नज़रें केवल इश्क पर...
तो
नादाँ मुझे समझ
तमीज थोड़ी मुझे बक्षने
की
दुआ करते हैं
ये..
नसीब को बेनसीब समझने वाले...

अपने लिए मांगो
चाहे दूसरों के लिए
भिकारी तुम्हे बना ही देते हैं
ये..
दिन-ओ-मजहब के जानने वाले...

बेसब्री पर तुम्हारी
रोटियां लेते हैं अपनी ये सेंक...
शिकायत करो जो तुम
अपने खालीपन की
तो
भूखे का तमगा तुमपर
लगा देते हैं
ये..
मुल्ला-ओ-पंडित-ओ-सियासत वाले...

सब्र हो जो तुम में
अब और यहाँ
जो है जैसा है
के
दिली क़ुबूल का..
देखें फिर किस तरह
चलते है धंधे
ये..
मंदिरों, मस्जिदों और नेताओं वाले...

ये..
नहीं कहता 'मनीष'
की
बैठ जाओ तुम
हाथ पर हाथ धर
भगवान् भरोसे...
कर्म करो ख़ुशी-ख़ुशी
पर
बनो न तुम हैवान हवस वाले...

Sunday, May 8, 2011

माँ ही तो है...



कविता..
महज जब कल्पनाओं की उड़ान हो
तो बासी लगती है
महिमा-मंडित हो जाये जब औरत
तो माँ सी लगती है
माँ  इसलिए महान नहीं की औरत है वो
मुझे पैदा किया
बस इसीलिए महान सी लगती है...

माँ ये है..
माँ वो है..
माँ ऐसी है..
माँ वैसी है..
माँ के लिए ये करो..
माँ के लिए वो करो..
इतना शोरगुल मचा है आज माँ के नाम का
की लगता है की एक ही दिन में सारा प्यार सिमट आया है
चलो..
कर्तव्यों की इतिश्री हुई
और साल भर की छुट्टी भी हुई...

पर..

इस सब हंगामे में
कोई नहीं जानता
की उस औरत का क्या हुआ
जो
माँ भी है..
माशूका भी है..
नानी भी है..
और दादी भी..
बहन भी है..
और है बीवी भी..
मगर इन सब से पहले है वो खालिस इंसान...

ये ठीक है..

की हर औरत माँ हो सकती है
पर इसमें इतना ख़ास क्या
माँ होना एक प्रकृति प्रदत्त उपहार है
जो निभाती है औरत
खुद को पूरा करने के लिए
ठीक उसी तरह..
जैसे ये सारा संसार चलता है
प्राकृतिक नियमानुसार
पर क्या ये सच है
क्या वाकई हम प्राकृतिक रूप से जी रहे हैं.....??

तो..

क्यों ना आज ही के दिन
खुद से एक सार्थक सवाल करे हर औरत
और हर वो इंसान
जिसके अन्दर शक्ति-स्वरूप है विराजमान
की

क्या वो जी रही है अपने प्राकृतिक धर्मानुसार
या फिर...
चल रही है वो मन निर्मित जगत अनुसार...??

अगर से
जी रही है वो धर्मानुसार
तो
उसकी संताने इतनी अधर्मी क्यूँ हुईं जा रही हैं..??
और जो नहीं चल रही वो मनानुसार
तो
पद-प्रतिष्ठा-सम्मान के लिए पागल क्यूँ हुई जा रही है..??
क्यूँ बराबरी करना चाहती है वो इन अधर्मियों से
क्यूँ वो मर्द सी हुई जा रही है..??



वो माँ ही तो है
कोई परम-पूज्य प्रकृति नहीं
क्यूँ फिर माँ होने पर इतना इठला रही है..??

वो माँ ही तो है
जो बो देती है बचपन में ही द्वैत के बीज
पूछती है जब वो अपने अबोध से
ये घिनोना सवाल
की
पापा ज्यादा अच्छे है या माँ......?

वो माँ ही तो है
जो भर देती हैं अपनी महत्वाकांक्षाओं का ज़हर
पूछती है जब वो अपने नादानी में
बड़े होकर क्या बनना चाहते हो.....?

वो माँ  ही तो है
जो अपने नन्हे में पैदा करती है डर
जिद करतें है वो जब मासूम सी
बना डरावने चेहरे जब वो कहती है
चुप कर...नहीं तो बाबा आ जाएगा - पुलिस ले जाएगा.....!!

वो माँ ही तो है
जो सिखाती है अपने लाडलों को चालबाजियाँ
कहती जब वो एक है और करती कुछ और है.....!!

वो माँ ही तो है
जो डाल देती है अपने अधकचरे अंधविश्वास अपने बच्चों में
बेवजह सर झुकाने को कहती है
जब वो मंदिरों और मस्जिदों में....?

वो माँ ही तो है
जो थोप देती है मजहब अपने कलेजे के टुकड़ों पर
गर्वित हो जब वो कहती है
बप्पा जय-जय करो बेटा.....!!

वो माँ ही तो है
जो कर जाती है झूठ को गरिमामय
अपनी सुविधा के लिए
बड़ी आसानी से जब वो कहती है
अंकल से कहना - पापा घर पर नहीं हैं.....!!

वो माँ ही तो है
जो उकसाती है द्वेष और प्रतिस्पर्धा  की क्रूर  भावनाएँ अपने सपूतों में
बड़ी अदा से ये कहकर की
चिंटू की तरह फर्स्ट आ कर दिखाओ -
तब साइकिल मिलेगी....हाँ !!

वो माँ ही तो है
वो माँ ही तो है
वो माँ ही तो है
पर वो भी क्या करे बेचारी
की उसे उसकी माँ ने
और उसकी माँ को उसकी भी माँ ने
यूँ ही मनानुसार जीना तो सिखलाया था...



वो ही सदियों से  सड़-गल  चुके
वो ही पुराने पाठ - वो ही पुराने संस्कार
घिसट रही है वो अब तक
के जबकि हकीकत ये है की
ज़माना बदल चूका है और वो भी....................!!




Friday, May 6, 2011

इश्क की बातें



इश्क की बातें
बातें है फ़कत - इश्क नहीं,
इज़हार-ए-इश्क बयाँ का नहीं मुतासिर
ये बयाँ तो बयाबाँ ही समझ सकेंगे.......!! 

फिर वो इश्क नहीं जो रंज-ओ-ग़म के आंसू बहाए,
छलक पड़े आँखें शुक्र-ओ-सुकून से तो बात और...
बात ये मगर...
प्रेम-भिखारी नहीं
प्रेम-पुजारी ही समझ सकेंगे........!!

समझ भी आ जाए गर ये बात
तो समझ न बैठना 
तू खुद को शिरी-ओ-फरहाद,
दास्ताँ तेरे इश्कां होने की
तेरे रहम-ओ-करम ही कह सकेंगे.........!!

रहम-ओ-करम वो नहीं
जो करता है तू
दिल-ओ-दिमाग की सुन,
फैसले ये रूहानी
दम-बा-दम अपनी हस्ती मिटाने वाले ही कर सकेंगे.........!!

क्या करें की साल-ओ-साल
लगे रहते हैं हम
खुद को सजाने-सँवारने में,
मजा मगर ये
की मिट्टी में मिलकर ही इश्क के लायक हम हो सकेंगे.........!!

तू ही लुहार,
तू ही सुनार
और जोहरी भी तू ही,
परखता भी तू है
चढ़ाता-उतारता भी तू है
और गलाता भी तू ही है खुद को
भगवान् भरोसे मगर हैवान इंसान न हो सकेंगे.........!!



Wednesday, May 4, 2011

प्रतिष्ठा की भूख




बस..
यही तो चाहते हैं
ये ज़माने वाले
की
ना कोई उनसे नाराज हो
ना किसी से उनको कोई नाराजी रहे..,
राजी हुए जो आप उनसे,
उनकी नासमझियों से
तो
बिठा लिए जाओगे सर पर
वर्ना
सूली तैयार है...
अब..
आप तो हमारी नादानियों से
इस कदर
राजी न होईये सरकार..!!
सुना है
आपके अंजुमन में
ग़लतफ़हमियों की कोई जगह नहीं होती
और..
जो होती हैं बला की खुशफहमियाँ
आपके चमन में
तो
सावधान हो जाईये सरकार..!!
की
ज़िन्दगी की शमशीर तैयार है...
ये..
इश्क-ओ-रसूल की बातें
बातें हैं बस
खुद को बचाने की
या..
यूँ कहिये की
खुद को रसूखदार बनाने के लिए
सच ही
गर सच की तलाश है
तो
जिलाना होगा हिम्मत को
चलने को अपनी ही राह
दिखाना होगा ग़ज़ब साहस
तोड़ने को प्रतिष्ठा की चाह
जीना होगा अदम्य
गिराने को भीड़ द्वारा अपनाए गए
पुरातन विश्वास
गलाना होगा सच की आग में
ज़माने के थोपे हुए संस्कार
और..
प्रतिष्ठित करना होगा सत्य को
व्यक्तियों से ऊपर रख
चाहे फिर झूठ
कितना ही बड़ा क्यों ना हो
कहना होगा उसे
ठीक वैसा ही
जैसा वो है
वर्ना
राजनीति का हार
आपके गले पड़ने को तैयार है...



Monday, May 2, 2011

लकीरे...ये मेरे हाथ की



लकीरें,
ये मेरे हाथ की
कुछ कहना चाहती है शायद...,

जानता हूँ मगर
की ज़िन्दगी ही है उनकी ज़बान..!!

भाग्य भरोसे जो शास्त्र है टिका,
वो हर दम खूब है बिका,

और क्यूँ ना हो..??

मानव मन सुरक्षा की चाह में ही तो जीता है,
सपनो के बड़े-बड़े घूँट दिन रात वो पीता है

भाता नहीं उसे " कर्मण्ये वाधिकारस्ते.." वाला श्लोक,
फल ही ना मिले तो क्या करना परलोक

हमें तो चाहिए वैभव कृष्ण सरीखा
भले ही फिर वो गीता में ना हो लिक्खा,

" वसुधैव कुटुम्बकम " का नारा भी उसे लगता है फीका,
अपने देश के आगे क्या लगे अमेरिक्का

वेद-पुराण-उपनिषद तो केवल स्वार्थ-सिद्धि के लिए है पीता,
दसों दिशाएं " उसकी " हैं क्या मुख, क्या अग्नि और क्या है चित्ता,

दसों द्वार " उसके " हैं क्या नेत्र, क्या बुद्धि और क्या रित-रीता,
करम गति को जान लो भैय्या,
भगत वही जो स्वयं को लेता है मिटटा
कहता है 'मनीष'
जो है तेरा मन-मित्ता...